Cinema Marte Dum Tak Review : बी ग्रेड सिनेमा की

‘सिनेमा मरते दम तक’ में अर्जुन कपूर की एंट्री सभी के लिए सरप्राइज होगा. अगर आप ये सीरीज देखना चाहते हैं, तो इससे पहले ये रिव्यू जरूर पढ़े.
Cinema Marte Dum Tak Review : बी ग्रेड सिनेमा की 'ए' Grade स्टोरी, एक गुम हुए दौर की दास्तांसिनेमा मरते दम तकImage Credit source: prime video
सीरीज : सिनेमा मरते दम तक
कास्ट: जे नीलम, दिलीप गुलाटी, विनोद तलवार, किशन शाह, सपना सप्पू
आज की बड़ी खबरें

निर्माता: वासन बाला और समीरा कंवर
निर्देशक: दिशा रिंदानी, जुल्फी और कुलिश कांत ठाकुर
स्ट्रीमिंग ऑन: अमेज़न प्राइम वीडियो
रेटिंग : ****
90 के दशक में मशहूर बी और सी ग्रेड फिल्मों के मार्किट की झलक पेश करती मोस्ट अवेटेड डॉक्यूमेंट्री सीरिज सिनेमा मरते दम तक शुक्रवार को अमेजॉन प्राइम पर रिलीज हो चुकी है. लगभग दो दशक पहले लोकल थिएटर्स की जान रही ये फिल्में अब ओटीटी और इंटरनेट के जमाने में गुम हो गईं हैं. सिंगल थिएटर के साथ साथ इन फिल्मों का लाखो करोड़ों का मार्केट अब खत्म हो गया है. अमेजान प्राइम की डॉक्यूमेंट्री सीरीज सिनेमा मरते दम तक उन प्रोडूसर और निर्देशकों की कहानी हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इस तरह की फिल्में बनाने में खर्च कर डाली.
वासन बाला और उनकी टीम ने ऐसे ही बी-ग्रेड सिनेमा बनाने वाले चार फिल्म निर्माताओं को ट्रैक किया और उनकी कहानी दर्शकों के सामने पेश की.
जानिए इस सीरीज के बारें में
सिनेमा में ग्रेड क्या मायने रखती हैं? पल्प फिल्में क्या होती हैं? क्या ग्लिट्ज़ और ग्लैमर इसके निर्माताओं के लिए लाई गई ‘भद्दी’ सामग्री अभी भी स्पष्ट है? अपना खुद का एक सफल मार्केट होने के बावजूद अक्सर कुछ फिल्मों को ‘बी’ और ‘सी-ग्रेड’ सिनेमा का लेबल दिया गया. अपनी आधी-अधूरी स्क्रिप्ट, खराब प्रोडक्शन क्वालिटी और ओवर-द-टॉप एक्टिंग के बावजूद यूपी और कई गांव में बसे हुए सिंगल थिएटर में ये फिल्में हाउसफुल हो जाती थी. इन फिल्मों का यूएसपी था एक्शन, हॉरर, जोखिम भरे संवाद, यौन हिंसा, बदला और साथ में तड़के की तरह लगने वाली अश्लीलता. बिजनेस का का ये फॉर्मूला, थोड़े बदलाव के साथ,भीड़ को सिंगल-स्क्रीन थिएटरों में आकर्षित करने के लिए बार-बार दोहराया गया.
इस सीरीज में चार निर्देशक – जे नीलम, विनोद तलवार, दिलीप गुलाटी और किशन शाह हैं – जिन्होंने 90 के दशक की ऐसी कई फिल्मों से अपना जादू बिखेरा था. प्राइम वीडियो की तरफ से उन्हें फिर एक बार उनके स्टाइल की शॉर्ट फिल्में बनाने के लिए कहा जाता है. उन्हें एक बार फिर से निर्देशक की भूमिका निभाने के लिए कम बजट किया जाता है, उन्हें फिर एक बार अपनी टीम बनाकर ये प्रोजेक्ट पूरा करने का चैलेंज दिया जाता है.
कहानी
जैसे-जैसे ये शो इन चार निर्देशकों को फॉलो करता है, उनके साथ दर्शक फिर एक बार 90 के दशक में लौट जाते हैं. आज गुमनामी की दुनिया में खोए हुए ये चार निर्देशक वो सुनहरा दौर याद करते हैं, आज किसी आम आदमी की तरफ लाइमलाइट से दूर अपना जीवन बिता रहे हैं ये कहानी के हीरो, उनके साथ काम करने वाले एक्टर्स- उनकी टीम को याद करते हुए पुरानी यादें ताजा करते हैं. इस डॉक्यूमेंट्री में ये भी दिखाया गया है कि किस तरह से एक हफ्ते में 2 लाख रुपये के बजट में ये टीम फिल्म बना रही हैं. उनके इंटरव्यू के बीच-बीच में इन फिल्मों की क्लिप भी दिखाई जा रही हैं.
क्यों देखे
ये ऐसी फिल्मों की दास्तां हैं, जो देखना हम पसंद नहीं करते लेकिन इस डॉक्यूमेंट्री की वजह से इस फिल्म इंडस्ट्री के बारें में कुछ ऐसी बातें पता चलती हैं, जो हम नहीं जानते थे. एक जमाने में बी ग्रेड फिल्म की श्रीदेवी नाम से जानी जाने वाली सपना सप्पू हो या फिर अब एक रेंट के घर में अपने साथियों के साथ जिंदगी का गुजारा करने वाली जे नीलम. सिंगल थिएटर अपने साथ कइयों के सपनों को ले डूबा, जो एक समय रीजनल मार्केट पर राज करते थे. कहा जाता है कि एक जमाने में कांति शाह की फिल्मों के समय पर सुभाष घई को भी फिल्म रिलीज करने के बारें में सोचना पड़ता था. लेकिन आज सबसे दूर ये कांति शाह अकेले अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं.
क्यों न देखे
अगर आपको आउट ऑफ बॉक्स कंटेंट देखना पसंद नहीं हैं, वो ये कहानी स्किप कर सकते हैं.ये भी पढ़ें

खास सपनों की आम कहानी
‘सिनेमा मरते दम तक’ जैसी कॉन्सेप्ट पर बनाई गई इस अपरंपरागत कहानी को दर्शकों के सामने पेश करने का दम दिखाकर प्राइम वीडियो ने कमाल कर दिया है. राज कपूर से लेकर धर्मेंद्र तक बड़े दिगज्जों के साथ काम करने का सपना देखने वाले इन निर्देशकों की कहानी सभी को सुननी चाहिए.

By Nikita

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *